रविवार, 18 मार्च 2018

*सभ्य कौन?*


ईश्वर ने इस सृष्टि में मनुष्य योनि को सबसे अधिक समझदार और होशियार बनाया है | अन्य जीव मनुष्य की तुलना में अल्पविकसित हैं | उनको समझ नहीं कि कौन सा कार्य किस प्रकार किया जाये | किंतु अपने जीवन में कुछ घटनाओं और व्यवहारों को देखकर मैने जाना कि इंसान ने ईश्वर के द्वारा दिये गये अनमोल तोहफ़े यानि समझदारी को त्याग दिया है जबकि अन्य पशु-पक्षियों में कई हद तक समझदारी देखी जा सकती है |

      आज मनुष्य जाति में विश्वास नहीं रहा, आपसी रिश्तों में समझदारी नहीं रही, जिसका श्रेय भी मनुष्य को ही जाता है | एक बार प्यार का व्यवहार करने पर कुत्ते जैसा जीव भी वफादारी निभाता है लेकिन आज के समय में मनुष्य का भरोसा नहीं, लाख प्यार देने के बाद भी वह धोखा दे सकता है | एक जीव आपकी मनोभावनाओं को अच्छे से समझ सकता है, लेकिन एक इंसान नहीं | किसी को अपशब्द बोलते समय कुत्ते शब्द का प्रयोग करना उस व्यक्ति का अपमान नहीं बल्कि वफादार प्राणी कुत्ते का अपमान है, क्योंकि कुत्ता तो प्यार निभाता है जबकि इंसान प्यार के बदले गला घोंटता है |

जानवरों को भी रहने का सलीका और सभ्यता होती है, उनके अन्दर भी भावनाएँ होती हैं लेकिन इस डिग्रीधारी, पढ़ी-लिखी, सुन्दर पोशाकधारी जाति के पास नहीं| आज चीटियों, ऊँटों या किसी भी जीव को देख लें तो वो कतार में अपने समाज के साथ चलता दिखाई देगा लेकिन मानव तो अपने समाज के साथ शत्रुवत व्यवहार करता है| इंसान टिकट की लाइन में सुकून और तहज़ीब से खड़ा नहीं होता | बस, रेल, फुटपाथ, सिनेमा, कतार सभी जगह गाली-गलौज करता है | यह है मानव की सभ्यता? इससे बेहतर तो पशु हैं|

    आज हम सबको अपने अपने काम और अपने अपने फायदे से मतलब है, लेकिन चींटी जैसे छोटे जीव को देखिए, किसी भी भार को सब मिलकर उठाते हैं | ऐसे ही अगर हम मनुष्य भी ज़िन्दगी में किसी भी परेशानी के भार को मिलकर उठाएँ तो हम लोगों के जीवन कितने हल्के हो जाएँ |

     हम किसी धोखेबाज व्यक्ति को आस्तीन का साँप बोलते हैं लेकिन मनुष्य से बड़ा धोखेबाज कोई प्राणी नहीं | बेचारा साँप भी बिना परेशान किए या बिना भय की आशंका के नहीं डसता | लेकिन यहाँ तो इंसान हर घड़ी एक दूसरे के लिए ज़हर उगल रहा है, जो उसको प्यार कर रहे हैं उन्हीं को डस रहा है |

       मैने देखा एक कार तेज़ रफ्तार में दौड़ रही थी और उसके पीछे एक कुत्ता दौड़ रहा था | दोनों ही दौड़ रहे हैं, जानवर भी और इंसान भी | बस अंतर इतना है कि एक पैदल दौड़ रहा है और एक गाड़ी में बैठकर | वह बेचारा पेट भरने के लिए | मनुष्य ने स्वयं को इतना विकसित करके पाया भी क्या? बस धन की भूख? ऐसी भूख जिसने इंसान की आँखों पर मतलबपरस्ती का पर्दा डाल दिया, जिसके कारण आज उसे किसी की भावनाएं और आत्मसम्मान भी नहीं दिखता |

      एक मृत्युभोज में देखा- भोजन बनाने के लिए लकड़ी फाड़ी गईं रोकर, पूड़ियों के लिए आटा गूँथा गया रोकर, पूड़ियाँ बनाई गईं रोकर, सब्जी काटी गई रोकर, सब्जी बनाई गई रोकर क्योंकि उस परिवार का प्रियजन बिछुड़ गया है सदा के लिए | यानी हर कृत्य आँसुओं से भीगा है | महाभारत ग्रन्थ में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण भी कहते हैं कि "यदि खिलाने वाला दुःखी हो, विपत्ति में हो, वहाँ भोजन ना करें | उस जगह भोजन करने से आयु और तेज घटता है |" जानवर भी दुःख का एहसास करते हैं, जिस दिन जिस जानवर का साथी बिछुड़ जाता है वह उस पूरे दिन चारा नहीं खाता | लेकिन देखो समझदार मनुष्य को एक व्यक्ति की मृत्यु पर हलवा पूड़ी खाकर शोक मनाता है | इससे बढ़कर निन्दनीय क्या है?

     देखो जानवर भी ईश्वर की सीख को मानते हैं लेकिन हम इंसान नहीं मानते | मुझे तो लगता है कि जानवर भी समर्थ या थोड़े और समझदार होते तो वे भी पूरे और शालीन वस्त्र पहनते, लेकिन इंसान को कौन समझाए? अब बताइये सभ्य कौन, अल्पविकसित होने के बावजूद भी प्रेम व भावनाओं की कद्र करने वाले वे चार पैर के जीव या किसी के प्रेम और भावनाओं को आहत करने वाला दो पैर का जीव?
       
       *शिवम सिंह सिसौदिया, ग्वालियर*

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